लोकसभा चुनाव मंदिर मस्जिद नहीं रोटी की बुनियाद पर होंगे ???


Asian Reporter Mail

लोकसभा चुनाव के बाद लगातार बिहार और बंगाल के इलावा कई राज्यों में भाजपा ने नरेंद्र मोदी के नेतृत्व में अपनी अजेयता का एक मिथक रच डाला था जिसे जनमत के तौर पर तैयार करने में भारतीय कॉरपोरेट मीडिया ने अपने तमाम नैतिक दायित्वों को परे रख कर अविश्वसनीय भूमिका निभाई थी जो अब से पहले शायद कभी नही हुआ था। लेकिन इन पांच राज्यों में हुए विधानसभा चुनावों के परिणामों ने उस मिथक को चकनाचूर कर दिया है और भाजपा अपने परम्परागत कहे जाने वाले राज्यों में लोकसभा चुनाव से ठीक 4 महीने पहले सत्ता से बाहर हो गयी है।
इन चुनावों के नतीजों ने कुछ चीज़ें एकदम आईने की तरह साफ़ कर दी हैं के जुमलेबाज़ी के साथ जनता को बहुत ज़्यादा दिनों तक प्रभावित नहीं रखा जाता है। साम्प्रदायिक मुद्दे बहुत थोड़े समय तक ही जनता के दिलो दिमाग़ को अपने क़ब्ज़े में रख पाते हैं और जल्दी ही जनता वापस रोटी और रोज़गार के सवाल पर लौट आती है।आज तमाम अख़बार,राजनैतिक विश्लेषक और सर्वे एजेंसियां ये स्वीकार कर रही हैं के मध्यप्रदेश राजस्थान और छत्तीसगढ़ में मुद्दों पर मतदान हुआ है और जनता ने ज़मीनी मुद्दों के सामने भाजपा के उग्र हिंदुत्व और विभाजनकारी एजेंडे को पूरी तरह ख़ारिज कर दिया है।
लोकसभा चुनावों से ठीक चार महीने पहले आये इन चुनावी नतीजों ने भारतीय राजनीति के पटल पर और भी काफ़ी कुछ तब्दील कर दिया है।लोकसभा चुनाव के बाद से भारतिय राजनीती पर नरेंद्र मोदी हावी थे और उन्हें नाक़ाबिल शिकस्त मान लिया गया था और जिस तरह राहुल गांधी को भारतीय राजनीति में अप्रभावी और नाकाम स्वीकार करते हुए संघ परिवार सहित भाजपा की वेतनभोगी आईटी सेल के द्वारा राहुल गांधी को नीचा दिखाने के लिए "पप्पू" वाली छवि निर्माण की थी,जिस में भारतीय मुख्यधारा की मीडिया ने शर्मनाक भूमिका निभाई थी,जनता ने जनादेश के माध्यम से उन सभी धारणाओं को इन पांच राज्यों के नतीजों में बदल कर ध्वस्त कर दिया है।

राजस्थान,मध्य प्रदेश और छत्तीसगढ़ के परिणामों ने उस सोच को काफ़ी हद तक बदल डाला है जिसके अंतर्गत ये तय मान लिया गया था के आमने सामने की लड़ाई में कांग्रेस आने वाले कई दशकों तक भाजपा और विशेष कर नरेंद्र मोदी के सामने कांग्रेस नहीं टिक सकती। दूसरी तरफ़ राहुल गांधी के बारे में ये तय मान लिया गया था के वो मोदी के सामने परास्त हो चुके हैं लेकिन इन राज्यों के परिणामों राहुल गांधी के नेतृत्व की विश्वसनीयता को भी मुहर लगाई है और लगभग ऊर्जाहीन हो चुकी कांग्रेस में ही नहीं पूरे विपक्ष में एक नयी उम्मीद जगाई है।

विगत साढ़े चार सालों से प्रचंड बहुमत के साथ सत्ता में रहते हुए भाजपा ने कोई ऐसा कारनामा अंजाम नहीं दिया है जिसकी बुनियाद पर वो जनता की अदालत में खड़ी हो कर दोबारा अपने पक्ष में अपील कर सके और यही वो कारण है के चुनावी वर्ष में लगातार भाजपा ने फिर से आक्रामक हिंदुत्व को हवा देने के लिये राम मंदिर का मुद्दा उठाया और चुनावों के दौरान ही जम कर इसे हवा दी गयी।भाजपा ये भूल गयी के राम मंदिर का मुद्दा उसके घोषणापत्र में तो है लेकिन विकास, रोज़गार, रोटी, किसान, सड़क, बिजली पानी के बाद के पन्नों पर है । मतदाताओं को साम्प्रदायिक उन्माद के आधार पर बांटने के लिए हार्डकोर हिंदुत्व का नया चेहरा जिसे अब राष्ट्रीय स्तर पर स्थापित करने का प्रयास संघ और भाजपा ने शुरू किया है,उत्तर प्रदेश के मुख्यमंत्री योगी आदित्यनाथ को मैदान में उतारा गया और जम कर नफ़रत का प्रचार किया गया लेकिन जनता ने तमाम विषबाण को नकारते हुए सकरात्मक मुद्दों पर अपना वोट दिया। 

भाजपा और संघ आज समझ चुके हैं के अब अगला लोकसभा चुनाव मोदी के चेहरे पर जीत पाना नामुमकिन है
और इस सोच को मध्यप्रदेश और छत्तीसगढ़ के चुनावों में और बल मिला है जब भाजपा नेताओं द्वारा लगाए जाने वाले बैनरों और पोस्टरों में मोदी की तस्वीर लगातार छोटी होती गयी और स्थानीय मुख्यमंत्री शिवराजसिंह और रमन सिंह के चेहरे बड़े होते गए।राजस्थान में वसुन्धरा राजे ने मोदी और शाह की कोई बात नहीं मानी जब के साल भर पहले तक ये सब नामुमकिन था।

इन चुनावों में किसान एक बहुत बड़ा फैक्टर साबित हुआ है इसमें कोई संदेह नहीं है।भाजपा लगातार किसानों की अनदेखी करती रही और उसके तमाम संघर्षों और आन्दोलनों को विपक्ष द्वारा प्रायोजित मान कर विपक्ष को कोई भाव न देने की मंशा से किसानों को कोई भाव नहीं दिया गया को भाजपा के लिए घातक सिद्ध हुआ जबके कांग्रेस ने किसानों के मुद्दों को जम कर जनता के सामने उठाया और उनके समाधान का आश्वासन देते हुए किसानों का भरोसा जितने में सफ़ल रही।

लोकसभा चुनावों से ठीक पहले होने वाले इन चुनावों को सेमी फ़ाइनल माना जा रहा था लेकिन आम तौर पर विधानसभा चुनावों के नतीजे लोकसभा चुनावों पर बहुत अधिक असरअंदाज़ नहीं होते। विगत 14 15 सालों पीछे ही अगर हम वापस चले तो 2003 में मध्यप्रदेश छत्तीसगढ़ और राजस्थान में भाजपा ने सरकार बनाई थी और ठीक 4 5 महीने बाद 2004 में एनडीए को लोकसभा चुनावों में करारी शिकस्त मिली।इसी तरह 2008 में भी भाजपा छत्तीसगढ़ और मध्यप्रदेश में चुनाव जीती और 2009 में लोकसभा चुनाव हार गई।ये नतीजे भी बताते हैं के विधानसभा और लोकसभा चुनावों के परिणाम अलग अलग फैक्टर्स से प्रभावित होते हैं।
लेकिन फिर भी अगर इसे मान लिया जाए के भाजपा के लिए इन परिणामों के आधार पर अगला लोकसभा चुनाव बहुत आसान नहीं होगा तब भी कांग्रेस को अत्यधिक आत्ममुग्ध होने की ज़रूरत नहीं है। उसे ये नहीं भूलना चाहिए के मध्यप्रदेश और राजस्थान में उसे सरकार बनाने का मौका भले ही मिल गया है लेकिन भाजपा ने अब भी वहां अपना दम ख़म बचाये रखा है और उसे काँटे की टक्कर दी है।राहुल गांधी को इन चुनावी नतीजों ने एक और बात साबित की है के गैर कांग्रेसी और ग़ैर भाजपाई दलों का भी अपना एक अस्तित्व बरक़रार है जिसे तेलंगाना में टीआरएस की जीत के तौर पर देखा जा सकता है।
तेलंगाना में टीआरएस की जीत ने बताया है के भारतीय राजनीति में क्षेत्रिय दलों के बढ़ते प्रभाव को ख़ारिज नहीं किया जा सकता।इस चुनावों में एक सबसे बड़ी बात ये रही के जनता ने किसी को सत्ता से बेदख़ल करने और किसी को सत्ता में बिठाने की तमाम गुंजाइशें अभी भी अपने पास ही रख ली हैं और साथ ही साथ ये भी तय हो गया है आने वाले लोकसभा चुनावों में किसान, रोज़गार, रोज़ी, रोटी, शिक्षा, स्वस्थ, जैसे जनहित के सकरात्मक मुद्दे सवाल और जवाब बनेंगे और दिल्ली का दशा और दिशा तय करेंगे और मंदिर मस्जिद की राजनीती करने वालों को ख़ारिज किया जाएगा।

इस चुनावों में एक सबसे बड़ी बात ये रही के जनता ने किसी को सत्ता से बेदख़ल करने और किसी को सत्ता में बिठाने की तमाम गुंजाइशें अभी भी अपने पास ही रख ली हैं और साथ ही साथ ये भी तय हो गया है आने वाले लोकसभा चुनावों में किसान, रोज़गार, रोज़ी, रोटी, शिक्षा, स्वस्थ, जैसे जनहित के सकरात्मक मुद्दे सवाल और जवाब बनेंगे और दिल्ली का दशा और दिशा तय करेंगे और मंदिर मस्जिद की राजनीती करने वालों को ख़ारिज किया जाएगा।

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