विपक्ष कहाँ खड़ा है पढ़िए : एक सटीक विश्लेषण


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आलेख - मुकुल सरल 

2019 की हार-जीत में मोदी जी की सौ 
ख़ूबियां और विपक्ष की सौ कमियां, सौ ग़लतियां मानते हुए मैं 101वीं बात करना चाहता हूं।

ये 101वीं बात है कि जब सामने वाला खिलाड़ी खेल के नियम ही न मानता हो तो कोई क्या करे?

वे लगातार कीचड़ में उतरते गए और उनका कमल खिलता गया।

विपक्ष मेहनती नहीं है, विपक्ष एकजुट नहीं था, विपक्ष के पास कोई एक विश्वसनीय चेहरा नहीं था, विपक्ष मोदी नहीं तो कौन?’ की काट नहीं ढूंढ पाया।

कांग्रेस में ये कमी है, समाजवादियों में वो कमी है। राहुल ऐसे हैं, अखिलेश वैसे हैं। माया कभी ज़मीन पर नहीं उतरतीं, कम्युनिस्ट ज़मीन से कट गए हैं। आदि...आदि।

विपक्ष ज़मीन के गुस्से को, युवाओं की बेरोज़गारी को, किसान की बदहाली को, उसकी आत्महत्या को, नोटबंदी को, जीएसटी की तबाही-बर्बादी को वोट में ट्रांसलेट नहीं कर पाया।

इन सब दावों, इन सब तर्कों को मानते हुए मैं पूछना चाहता हूं कि ज़मीन पर गुस्सा था या नहीं।

मेरी समझ से- गुस्सा था। बहुत गुस्सा था। पूरे देश ने किसानों के लगातार आंदोलन देखे। कभी मुंबई कूच, कभी दिल्ली कूच। किसानों ने सीधा-सीधा सरकार से टक्कर ली। ये आंदोलन इतना तेज़ था कि बीजेपी को अपना मंदिर मुद्दा भी ठंडे बस्ते में डालना पड़ा। 2018 के नवंबर महीने में संघ और बीजेपी के अयोध्या चलो का नारा किसानों के दिल्ली चलो के आगे फेल हो गया। और संघ-बीजेपी ने उसके बाद अयोध्या या मंदिर मुद्दे की बात नहीं की।

हमने औद्योगिक मज़दूरों की बड़ी हड़ताल देखी। दावा किया गया कि संगठित और असंगठित क्षेत्र के करीब 20 करोड़ मज़दूरों ने इसमें हिस्सा लिया।

20 करोड़ मज़दूर...आप समझ रहे हैं कि 20 करोड़ कितनी बड़ी संख्या होती हैइन चुनावों में करीब 61 करोड़ मतदाताओं ने वोट किया। इस हिसाब से देखें तो करीब 33 प्रतिशत। ये वोट किसी की भी सरकार बना सकता है, कोई भी सरकार गिरा सकता है।

हमने चुनाव से ऐन पहले छात्र-युवा-शिक्षक आंदोलन देखे। यंग इंडिया अधिकार मार्च देखा। महिलाओं की एकजुटता देखी। दलितों का गुस्सा देखा। आदिवासियों की मुश्किलें देखीं। मुसलमानों पर हमले देखे।

उद्योगपतियों को देश का पैसा लेकर विदेश भागते देखा और रफ़ाल भी देखा। देखा किस तरह देश की सुरक्षा ज़रूरतों से समझौता किया जा रहा है।

लेकिन ये कुछ भी वोट में नहीं बदल पाया और बीजेपी को छप्पर फाड़ वोट और सीट मिलीं। पिछली बार (2014) से भी ज़्यादा।

यूपीए के दस साल के शासन के बाद 2014 में आए बदलाव में फिर भी एक सकारात्मकता थी। लोग भ्रष्टाचार से त्रस्त थे। उस समय बीजेपी के पास फिर एक बार…’ की जगह अबकी बार... का नारा था और अच्छे दिन का सपना भी। हर साल एक करोड़ से दो करोड़ नौकरियां देने का वादाविदेशों से काला धन वापस लाने का वादा और उसके जरिये सबके खाते में 15 लाख डालने का अनकहा वादा यानी जिसे वास्तव में कहा तो नहीं गया लेकिन भ्रम ज़रूर पैदा किया गयालेकिन इस बार क्या था? इन सब क्षेत्रों में नाकामी का दस्तावेज़... फेल का रिपोर्ट कार्ड।

फिर ऐसे नतीजे क्यों आएविपक्षी नाकारा थे, तो जनता तो त्रस्त थी।

ऐसा क्यों हुआ कि विपक्ष अपनी ग़लतियों के चलते हार गया लेकिन सत्ता पक्ष अपनी ग़लतियों के चलते जीत गया।

हक़ीक़त यही है कि मोदी जी चुनाव को उस स्तर पर ले गए जहां उनसे लड़ने के लिए या तो उससे नीचे उतरिये या फिर हार मान जाइए।

जनता ने 2016 के बाद से सक्रिय रूप से अपना गुस्सा जाहिर किया। अंतिम साल 2018 तो आंदोलनों का ही साल रहा। पहली बार इतने लेखक, बुद्धिजीवियों, कलाकारों, फ़िल्मकारों यहां तक वैज्ञानिकों और पूर्व सैन्य अधिकारियों तक ने अपने नाम के साथ अपील जारी कीं, लेकिन कुछ काम नहीं आया।

ये कुछ भी नकली नहीं था। बस बात वही है कि आप 5 साल आंदोलन कीजिए और वो अंत समय में पुलवामा और बालाकोट कर दें, तो आप क्या कर लोगे।

आप जन मुद्दों की बात कीजिए और वे पूरे चुनाव को हिन्दू-मुस्लिम पर ले जाएं, अली-बजरंगबली पर ले जाएं, हिन्दू आतंकवादी नहीं होताऔर जो ऐसा कहता है वो पाप करता है, पूरा विमर्श इस जगह ले जाएं। आतंकी गतिविधियों की आरोपी प्रज्ञा ठाकुर को टिकट दें और गोडसे की जय-जयकार करने लगें। शहीदों के नाम पर वोट मांगने लगें, तो फिर आप इन मुद्दों की काट कैसे करोगे?  

कैसे काट करोगे जब मीडिया उनका गुलाम हो जाए। उन्हें कलियुग का अवतार घोषित कर दे!

कैसे काट करोगे नफ़रत की, युद्धोन्माद की, बहुसंख्यकवाद की?

आप फिर कहेंगे कि ज़मीन पर आंदोलन करके ही इन मुद्दों की काट हो सकती है, जनता की चेतना बढ़ाकर ही इसे बदला जा सकता है, मेरा मानना भी यही है, लेकिन क्या कीजिएगा जब आप पांच साल ज़मीन पर उनकी हर जनविरोधी नीतियों के ख़िलाफ़ लड़ेंगे और अंत में वे कुछ आर्थिक सुविधाएं, कुछ पैसा और ऐसा ही झूठ-सच और उग्र राष्ट्रवाद जगाकर वोट ले जाएंगे।

आप पांच साल उनके ख़िलाफ़ लड़ेंगे लेकिन वे आख़िरी साल (2024) में पाकिस्तान के ख़िलाफ़ लड़ेंगे या लड़ने का नाटक करेंगे और आप फिर इसी तरह हार की समीक्षा करते हुए 2029 की तैयारी करेंगे या हो सकता है कि तब तक तैयारी के लिए कोई चुनाव बचे ही नहीं।

आप कहेंगे कि मैं कुछ ज़्यादा ही हताश या निराशावादी हो रहा हूं, बिल्कुल नहीं, मैं जानता हूं कि इस बार भी कई जगह जनता ने बेहतर तालमेल दिखाकर बिना किसी भ्रम के एकजुट होकर बीजेपी और उसके सहयोगियों को हराया। दक्षिण भारत इसका बेहतर उदाहरण है। उत्तर भारत में भी कई जगह यह देखने को मिला। पश्चिमी उत्तर प्रदेश की बिजनौर, मुरादाबाद, सहारनपुर लोकसभा सीट के नतीजे इसी की गवाही देते हैं। जहां जनता ने पार्टियों से पहले ही बेहतर तालमेल और गठबंधन करके मोदी जी को मात दी। जी हां, मैं यहां मोदी इसलिए कह रहा हूं क्योंकि उनके मुताबिक हरेक सीट पर वही खड़े थे। एक-एक वोट उनके नाम पर उनके खाते में जा रहा था तो एक-एक विरोधी वोट भी उनके ख़िलाफ़ ही माना जाएगा। मैंने अपने एक विश्लेषण में विस्तार से इसका जिक्र भी किया है।


लेकिन सच जानिए कि इस बार उनके पास पाकिस्तान और राम मंदिर के अलावा एक दूसरी बाबरी मस्जिद (ज्ञानवापी मस्जिद) भी है जहां प्रधानमंत्री का ड्रीम प्रोजेक्ट काशी-विश्वनाथ मंदिर कॉरिडोर जोरो-शोरो से चल रहा है। और आपको पता है कि हमें निर्माण से ज़्यादा विध्वंस में दिलचस्पी है।

साभार - न्यूज़क्लिक 

लेकिन सच जानिए कि इस बार उनके पास पाकिस्तान और राम मंदिर के अलावा एक ‘दूसरी बाबरी मस्जिद’ (ज्ञानवापी मस्जिद) भी है जहां प्रधानमंत्री का ड्रीम प्रोजेक्ट ‘काशी-विश्वनाथ मंदिर कॉरिडोर’ जोरो-शोरो से चल रहा है। और आपको पता है कि हमें निर्माण से ज़्यादा विध्वंस में दिलचस्पी है।

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