पूरी दुनिया के इंसाफ पसंद लोग 15 मई को "यौम ए नकबा" के रूप मे मनाते हैं


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वसीम अक्रम त्यागी की क़लम से 

15 मई! दुनिया के इतिहास का वह दिन जब फ़लस्तीनियो ने अपनी ज़मीन पर जबरन बसाए गए इजरायल के ख़िलाफ आवाज़ उठाई। पूरी दुनिया के इंसाफ पसंद लोग 15 मई को "यौम ए नकबा" के रूप मे मनाते हैं। फ़लस्तीनियों की त्रासदी की शुरूआत भी उसी दिन से हो गई थी। फ़लस्तीनी लोग इस घटना को 14 मई के बजाय 15 मई को याद करते हैं। वो इसे साल का सबसे दुखद दिन मानते हैं। 15 मई को वो 'नकबा' का नाम देते हैं. नकबा का अर्थ है 'विनाश', ये वो दिन था जब उनसे उनकी ज़मीन छिन गई थी, और 71 साल से वे अपने मुल्क की आज़ादी के लिऐ संघर्ष कर रहे हैं। नकबा यानि विनाश के दिन की शुरुआत 1998 में फ़लस्तीनी क्षेत्र के तब के राष्ट्रपति यासिर अराफ़ात ने की थी। इस दिन फ़लस्तीन में लोग 14 मई 1948 के दिन इसराइल के गठन के बाद लाखों फलस्तीनियों के बेघर बार होने की घटना का दुख मनाते हैं। "14 मई 1948 के अगले दिन साढ़े सात लाख फ़लस्तीनी, इसराइली सेना के बढ़ते क़दमों की वजह से घरबार छोड़ कर भागे या भगाए गए थे। कइयों ने ख़ाली हाथ ही अपना घरबार छोड़ दिया था। कुछ घरों पर ताला लगाकर भाग निकले। यही चाबियां बाद में इस दिन के प्रतीक के रूप में सहेज कर रखी गईं"।
कुछ महीने पहले मैं ईरान यात्रा पर गया था जहां पर मुझे ईरान के तीन शहर तेहरान क़ुम और मशहद जाने का मौका मिला था। ईरान की राजधानी तेहरान के मकानों की दीवारें इजरायल विरीधी और फ़लस्तीन की आज़ादी समर्थित नारों और तस्वीरों से पुती हुई हैं। यहां यह बताना जरूरी है कि ईरान एक ऐसा मुल्क है जिसकी न तो सीमा फ़लस्तीन से मिलती है, और न मसलक़ लेकिन उसके बावज़ूद ईरान फ़लस्तीन की आज़ादी के लिए संघर्ष कर रहा है बल्कि फ़लस्तीनियो की हर संभव मदद भी कर रहा है। तेहरान में एक दीवार पर अयातुल्लाह रूहुल्ला ख़ुमैनी की बङी सी पेंटिंग बनी हुई है जिस पर फारसी में लिखा है 'इसराइल को मिट जाना चाहिए' ऐसा ही पेंटिंग, नारे तस्वीरें ईरान के 'इल्म का शहर' कहे जाने वाले क़ुम में भी पुते हुऐ हैं। फिलहाल जो तस्वीरें आप देख रहे हैं ये तस्वीरें इस्लामिक संस्कृति का शहर कहे जाने वाले मशहद की हैं। यहीं पर शिया समुदाय के आठवें इमाम इमाम अली रज़ा का रोज़ा है, जिसे Imam Reza Shrine के नाम से जाना जाता है, दरअस्ल यह एक मस्जिद है और इसी के अंदर इमाम रज़ा का रोज़ा है। इस मस्जिद का शुमार विश्व की सबसे बङी मस्जिदो में किया जाता है, इसमें एक साथ छः लाख नमाज़ी नमाज़ अदा कर सकते हैं। 
मस्जिद के सहन की दीवारों पर इस तरह की बहुत सी तस्वीरें और नारे लिखे हैं जो फ़लस्तीन की आज़ाद का समर्थन करते हैं। जो तस्वीर आप इस संवाददाता के सामने देख रहे हैं यह भी इसी मस्जिद के सहन की है। साथ ही इसी मस्जिद के सहन में मस्जिद ए अक़्सा की भी एक 'डमी' बनाई गई है, ताकि यहां आने वाले ज़ायरीनों के अंदर फ़लस्तीन की आज़ादी जज़्बा पैदा किया जा सके। इस संवाददाता के सामने जो तस्वीर आप देख रहे हैं उस पर फारसी में एक नारा लिखा है, जिसका अनुवाद है 'इजरायल 25 साल में मिट जाएगा' यह नारा कितना बङा सच साबित होगा इसका फैसला आने वाला वक्त करेगा। फिलहाल तो ईरान फ़लस्तीनियों का समर्थन करने की भारी क़ीमत चुका रहा है, उस पर तमाम तरह के प्रतिबंध लगाए जा चुके हैं, भारत और चीन जैसे शक्तिशाली राष्ट्र ने भी अमेरिका द्वारा ईरान पर लगाए गए प्रतिबंधो को खामोशी से स्वीकार कर लिया है। ईरान भी अपने ऊपर लगाऐ गए प्रतिबंधों को सहन कर रहा है क्योंकि ईरान की इस्लामिक क्रान्ति के नेता अयातुल्लाह खुमैनी ने ईरानियों से कहा था कि अगर दुश्मन यह समझता है कि हम पर प्रतिबंध लगाकर वह हमारा हौसले को शिकस्त दे देगा तो वह गलत है, क्योंकि हमारे सामने कर्बला और माह ए रमजान है जो हमें संघर्ष सिखाता है लेकिन अत्याचारी के सामने झुकना नही सिखाता। सवाल यह है कि आज ऐसे कितने मुस्लिम राष्ट्र हैं जो फ़लस्तीन की आज़ादी के लिऐ ऐसी क़ीमत चुकाने को तैयार हैं जैसी ईरान चुका रहा है?

 

सवाल यह है कि आज ऐसे कितने मुस्लिम राष्ट्र हैं जो फ़लस्तीन की आज़ादी के लिऐ ऐसी क़ीमत चुकाने को तैयार हैं जैसी ईरान चुका रहा है?

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