आज से पहले आपने किस आईपीएस अफसर के बारे में यह सुना है कि उसे अदालत ने हिरासत में हुई मौत के मामले में जिम्मेदार ठहराते हुए उम्रकैद की सजा सुनाई है?


Editor :tasneem kausar

गिरीश मालविया की क़लम से 

आज से पहले आपने किस आईपीएस अफसर के बारे में यह सुना है कि उसे अदालत ने हिरासत में हुई मौत के मामले में जिम्मेदार ठहराते हुए उम्रकैद की सजा सुनाई है?

खबरों से जुड़े रहने के लंबे अनुभव के बाद भी मैंने ऐसी घटना स्वतंत्र भारत के राजनीतिक इतिहास में कभी नही सुनी?.......... क्या यह साफ साफ बदले की कार्यवाही नही है ?

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लगभग तीस साल पुराने मामले में पूर्व आईपीएस अधिकारी संजीव भट्ट को गुजरात में जामनगर सत्र न्यायालय ने आजीवन कारावस की सजा सुनाई है, उस वक्त संजीव भट्ट जामनगर में एएसपी यानी असिस्टेंट सुप्रिटेंडेंट ऑफ़ पुलिस के पद पर थे. वह 1990 वो वक़्त था जब बिहार में भाजपा नेता लालकृष्ण आडवाणी की अयोध्या रथयात्रा को रोका गया और उन्हें गिरफ़्तार कर लिया गया था.

उनकी गिरफ़्तारी के बाद देश भर में भारत बंद की कॉल दी गई थी और कई जगह दंगे भी भड़क उठे थे ऐसी ही एक घटना जामनगर में हुई जिसमें प्रभुदास माधवजी वैशनानी सहित 133 लोगों को टाडा कानून के अंतर्गत हिरासत में लिया गया वैश्नानी को नौ दिन तक पुलिस हिरासत में रखा गया था. बाद में जमानत पर रिहा कर दिया गया रिहा होने के ठीक दसवें दिन बाद इलाज कराते हुए अस्पताल में उनकी मौत हो गई. मेडिकल रिकॉर्ड के अनुसार, गुर्दो फेल हो जाने की वजह से मौत हुई थी.

उनके भाई ने पुलिस हिरासत में मारपीट का इल्जाम लगाया और संजीव भट्ट और अन्य अधिकारियों के खिलाफ हिरासत में प्रताड़ना के आरोप में केस दर्ज किया गया. साल 1995 में मजिस्ट्रेट द्वारा इस मामले का संज्ञान लिया गया था. हालांकि 2011 तक इस मामले में कोई कार्रवाई नहीं हुई क्योंकि गुजरात हाईकोर्ट ने इस पर रोक लगा दी थी. बाद में उन पर मुकदमा चलाया गया

संजीव भट्ट उस वक्त सुर्खियों में आए जब 2002 गुजरात दंगे में उन्होंने उस वक्त राज्य के मुख्यमंत्री रहे नरेंद्र मोदी की कथित भूमिका को लेकर गंभीर आरोप लगाए थे बाद में संजीव भट्ट ने गुजरात दंगों को लेकर कई ओर खुलासे भी किये , भट्ट को अन्ततः गृह मंत्रालय ने अगस्त 2015 में ‘सेवा से अनाधिकृत रूप से अनुपस्थित’ रहने की वजह से पद से बर्खास्त कर दिया.......

संजीव भट्ट ने सुप्रीम कोर्ट में याचिका दायर कर कहा कि मामले में 300 गवाहों के बयान लिए जाने थे लेकिन कई महत्वपूर्ण गवाहों को छोड़कर सिर्फ 32 गवाहों का ही परीक्षण किया गया. भट्ट ने कहा, मामले की जांच करने वाले तीन पुलिस अधिकारियों और अन्य गवाह जिन्होंने कहा कि हिरासत में कोई प्रताड़ना नहीं हुई थी, उन लोगों के बयान नहीं लिए गए.

यह मामला बताता है कि न्याय की असलियत क्या है, मुझे दो दिन पहले दिया गया चीफ जस्टिस रंजन गोगोई का स्टेटमेंट याद आ रहा है जो उन्होंने रूस के सोची में शंघाई सहयोग संगठन (एससीओ) के मुख्य न्यायाधीशों के एक सम्मेलन में कहा 'दुनियाभर में ऐसी स्थितियों ने न्यायिक इकाइयों पर भारी दबाव डाला है और यह कोई आश्चर्य की बात नहीं है कि कुछ न्यायिक क्षेत्रों में न्यायपालिका ने भी लोकलुभावन ताकतों के आगे घुटने टेके हैं'।

अभियोजन पक्ष ने आरोप लगाया था कि यह मामला एक सांप्रदायिक दंगें से जुड़ा था जब भट्ट ने सौ से अधिक लोगों को हिरासत में लिया था और इनमें से एक हिरासत में लिए गए व्यक्ति की मौत उसकी रिहाई के बाद अस्पताल में हुई थी. मृतक प्रभुदास के घरवालों ने आरोप लगाया था कि संजीव भट्ट ने अपने साथियों के साथ प्रभुदास के साथ मारपीट की, जिस वजह से प्रभुदास की मौत हो गई.

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