सोनभद्र की उस ‘खूनी’ जमीन की दास्तान


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सोनभद्र की उस ‘खूनी’ जमीन की दास्तान

 

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उत्तर प्रदेश के सोनभद्र जिले में पिछले हफ्ते जमीनी विवाद में हुए दस लोगों की हत्या के पीछे उम्भा गांव में सैकड़ों बीघा ऐसी जमीनें हैं जो किसकी हैं, यही स्पष्ट नहीं है.

उम्भा गांव में पहुंचते ही कच्चे मकानों की बस्ती के थोड़ा आगे सड़क के दोनों ओर के खेत अभी भी घटना की गवाही देते मिलेंगे. ट्रैक्टरों के बेतरतीब पहियों के निशान के अलावा तमाम चीजें इधर उधर बिखरी मिल जाएंगी जो 17 जुलाई को हुए संघर्ष के दौरान इधर-उधर फेंक दी गई थीं. स्थानीय लोगों की मानें तो जिस जमीन पर कब्जे की नीयत से प्रधान और उनके लोग खेत जोतने आए थे, उसे दो साल प्रधान यज्ञदत्त भुर्तिया ने खरीद भले ही लिया था लेकिन उस जमीन को वहां के कोल आदिवासी पीढ़ियों से अपना समझकर खेती कर रहे थे और सरकारी दस्तावेजों में भी इस जमीन का मालिकाना हक बहुत स्पष्ट नहीं है. हालांकि इस तरह की उम्भा गांव में करीब छह सौ बीघा जमीन है लेकिन जिस जमीन पर अधिकार को लेकर गांव के प्रधान और आदिवासियों के बीच विवाद हुआ, वह जमीन अपने आप में काफी रहस्यमयी है.

उम्भा गांव की यह जमीन दो साल पहले तब चर्चा में आई जब ग्राम प्रधान ने इस जमीन को खरीद लिया. गांव वालों की ओर से वकील नित्यानंद द्विवेदी बताते हैं, "दो साल पहले तक पूरी जमीन आदर्श कोऑपरेटिव सोसाइटी के नाम से थी और इन आदिवासियों को सोसाइटी के लोगों ने इस भ्रम में रखा था कि आप लोग भी मेंबर हो और खेती करके उसका कुछ हिस्सा सोसाइटी को दिया करो. आदिवासी पीढ़ियों से ऐसा ही करते चले आए थे लेकिन दो साल पहले सोसाइटी की सौ बीघा जमीन प्रधान ने खरीद ली और अपना अधिकार जताने लगे.”

बताया जा रहा है कि यह जमीन किसी स्थानीय राजा की रियासत के तहत आती थी. बड़हर रियासत की इस गांव में छह सौ बीघा जमीन है. पहले यह जमीन वन विभाग के तहत दर्ज थी लेकिन बाद में इसे बंजर बताकर ग्राम सभा की संपत्ति के तौर पर दर्ज कर दिया गया. गांव वाले इस जमीन को 1952 तक जोतते रहे लेकिन उसी साल पश्चिम बंगाल कैडर और बिहार के निवासी एक आईएएस अधिकारी प्रभात कुमार मिश्रा ने आदर्श कोऑपरेटिव सोसाइटी बनाकर जमीन का काफी हिस्सा सोसाइटी के अधीन कर लिया.

ये सारी कार्रवाई कैसे हुई और किन वजहों से हुई, इसका जवाब न तो राजस्व विभाग के अधिकारियों के पास है और न ही सरकार के पास. गांव वालों को तो खैर इसके बारे में क्या ही पता होगा. उम्भा गांव की अधिकतम आबादी गोंड आदिवासियों की है और ये ज्यादातर इन्हीं जमीनों पर या तो खेती करते हैं या फिर मजदूरी.

इसी जमीन पर खेती करने वाले उम्भा गांव के निवासी प्यारेलाल कहते हैं कि सोसाइटी बनने के बाद उनके पूर्वजों को भी कहा गया कि वो भी सोसाइटी के मेंबर हैं और पहले जैसे खेती करते थे, अब भी करते रहें. वकील नित्यानंद द्विवेदी कहते हैं कि 1989 में यह जमीन सोसाइटी की ओर से प्रभात कुमार मिश्रा और उनके कुछ रिश्तेदारों के नाम कर दी गई जो कि किसी भी तरह से वैध नहीं था.

उनके मुताबिक, "दिक्कत तब भी नहीं और आदिवासी लोग खेती करते रहे और एक धनराशि सोसाइटी के नाम पर जमा करते रहे. जिनकी जमीन थी, उन लोगों ने यहां बड़े पैमाने पर एक बार खेती कराने की योजना बनाई लेकिन जमीन कब्जा करना एक बड़ी समस्या थी, इस वजह से उन्होंने इरादा बदल दिया. साल 2017 में इसी वजह से सौ बीघा जमीन गांव के प्रधान जो कि काफी जमीन वाले और पैसे वाले हैं उन्हें बेच दी. प्रधान को उम्मीद थी कि वो आदिवासियों से छीनकर जमीन पर कब्जा ले लेंगे और उसी का ये नतीजा है कि इतना बड़ा संघर्ष हुआ.”

उम्भा गांव के निवासी सुंदर कहते हैं कि उन लोगों को इस बारे में कुछ भी नहीं पता था कि जमीन किसने खरीदी है और किसने बेची है, "दो साल पहले धान काटने के लिए प्रधान के लोग अचानक आ गए. हम लोगों ने विरोध किया तो कहने लगे कि अब ये जमीन हमारी है और तुम लोग खेती नहीं करोगे. हम लोगों ने कहा कि गरीब लोग हैं, क्या खाएंगे अगर खेती नहीं करेंगे तो कोई जवाब नहीं दिया. इस बार इतने सारे लोग गोली बंदूक के साथ अचानक खेत पर कब्जा करने आ गए.”

स्थानीय लोगों के मुताबिक बड़हर रियासत की जमीन को ग्राम सभा की जमीन बनाना, फिर उसे सोसाइटी को देना और फिर सोसाइटी की ओर से निजी व्यक्ति को बेच देना, ये सब कुछ गैरकानूनी था और नियमों को धता बताकर किया जाता रहा लेकिन कुछ स्थानीय अधिकारियों की मिलीभगत से ये सब होता रहा और किसी को खबर तक नहीं लगी. स्थानीय पत्रकार अनुज कहते हैं, "खबर तो अब भी न लगती यदि इतनी बड़ी घटना न हुई होती.”

इस जमीन से जुड़े तमाम सवालों के जवाब अधिकारियों के पास भी नहीं हैं. राज्य सरकार ने घोरावल तहसील के तमाम अधिकारियों को घटना के बाद ही निलंबित कर दिया था लेकिन जमीन से जुड़े तमाम सवालों के जवाब अब तक नहीं मिल सके हैं. सरकार ने इसके विभिन्न पहलुओं की उच्चस्तरीय जांज कराने के आदेश दिए हैं. वहीं इस पूरे मामले में राजनीति भी अपने चरम पर पहुंचती दिख रही है.

शनिवार को कांग्रेस नेता प्रियंका गांधी को चुनार के गेस्ट हाउस में कथित तौर पर हिरासत में लेने और उम्भा गांव न जाने देने की सरकार की जिद को लेकर राजनीतिक सरगर्मी तेज रही. हालांकि करीब तीस घंटे की उठापटक के बाद पीड़ित परिवारों को चुनार के किले में ही लाकर प्रियंका गांधी से मिलवाया गया. लेकिन उसके अगले दिन जब मुख्यमंत्री योगी आदित्यनाथ उम्भा गांव पहुंचे तो ये चर्चा भी तेज रही कि आखिर घटना के चार दिन बाद वो यहां क्यों आए जब इस मुद्दे का प्रियंका गांधी की वजह से इतना राजनीतिकरण हो गया.

बहरहाल, पीड़ित परिवारों से उनके गांव जाकर मिलने की प्रियंका गांधी की जिद भले ही पूरी न हुई हो लेकिन परिवारों से मिलने का उनका मकसद तो पूरा हुआ ही, पीड़ित परिवारों का मुआवजा बढ़ाने की उनकी मांग का भी असर दिखा. पहले इन परिवारों को सिर्फ पांच लाख रुपये देने की घोषणा हुई थी लेकिन बाद में सभी मृतकों के परिजनों को 18.5 लाख रुपये का अतिरिक्त मुआवजा देने का भी योगी आदित्यनाथ ने एलान किया.

 

 

गांव वाले इस जमीन को 1952 तक जोतते रहे लेकिन उसी साल पश्चिम बंगाल कैडर और बिहार के निवासी एक आईएएस अधिकारी प्रभात कुमार मिश्रा ने आदर्श कोऑपरेटिव सोसाइटी बनाकर जमीन का काफी हिस्सा सोसाइटी के अधीन कर लिया.

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