संविधान रक्षा की शपथ की यह खबर और अखबारों में क्यों नहीं है? आज पढ़िए पहले पन्ने की कुछ खास खबरें


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संजया कुमार सिंह की क़लम से 

 

संविधान रक्षा की शपथ की यह खबर और अखबारों में क्यों नहीं है?
आज पढ़िए पहले पन्ने की कुछ खास खबरें

आज दैनिक भास्कर में प्रधानमंत्री की दो तस्वीरें हैं – एक 2014 की जब उन्होंने पहली बार संसद पहुंचने पर सीढ़ियों पर माथा टेका था। अखबार ने बताया है कि कल उन्होंने संविधान को नमन किया। इसकी फोटो भी है। अखबार ने इन फोटुओं का शीर्षक लगाया है, “संविधान ही सर्वोपरि : लोकतंत्र के ग्रंथ को नमन”। नवोदय टाइम्स में भी दोनों तस्वीरें हैं और बड़ी सी खबर। नवोदय टाइम्स में अकु श्रीवास्तव की टिप्पणी, “संविधान के आगे नतमस्तक होने के गहन अर्थ” भी है। इसका फ्लैग शीर्षक है, “मोदी ने समझाया, क्या है दिल्ली की दुनिया”। आज की सभी खबरों में निश्चित रूप से यह बड़ी खबर है कि राष्ट्रीय जनतांत्रिक मोर्चा का नेता चुने जाने से पहले नरेन्द्र मोदी संसद भवन के सेंट्रल हॉल में विशेष रूप से रखे गए 'भारत का संविधान' के सामने नतमस्तक हुए। इसीलिए, नवोदय टाइम्स ने आज की खबर या लीड का शीर्षक लगाया है, “संविधान की रक्षा की शपथ”।

आपको याद होगा कि गए साल सितंबर में भाजपा अध्यक्ष अमित शाह ने कहा था कि हम 2019 का लोकसभा चुनाव जीतने जा रहे हैं और 2019 का चुनाव जीतने के बाद अगले 50 सालों तक कोई भी हमें हटा नहीं पाएगा। यह बात हम घमंड के कारण नहीं बल्कि अपने काम के बल पर बोल रहे हैं। इसके बाद, उत्तर प्रदेश के उन्नाव से भाजपा सांसद साक्षी महाराज ने कहा था कि 2024 में लोकसभा चुनाव की कोई जरूरत नहीं होगी और इसके लिए वह मोदी लहर का धन्यवाद देते हैं। इसके बाद पार्टी और स्वयं साक्षी महाराज ने जो स्पष्टीकरण दिया वह अपनी जगह रिकार्ड में है पर तथ्य यह है कि साक्षी महाराज उन्नाव से फिर भाजपा के उम्मीदवार थे और रिकार्ड तोड़ जीत हासिल की है। 2014 में तीन लाख दस हजार से ज्यादा वोट से जीतने वाले साक्षी महाराज इस बार चार लाख से भी ज्यादा वोट से जीते हैं।

इस लिहाज से लोकसभा में साक्षी महाराज, गिरिराज सिंह और साध्वी प्रज्ञा ठाकुर जैसे सांसदों के नेता नरेन्द्र मोदी द्वारा संविधान को नमन करना खबर ही नहीं, रिकार्ड के लिए सूचना भी है। कहने की जरूरत नहीं है कि तस्वीर के लिहाज से संविधान का नमन करते हुए नरेन्द्र मोदी की फोटो वैसे भी पहले पन्ने पर छपने लायक है। लेकिन मैं जो अखबार देखता हूं उनमें दैनिक जागरण और अमर उजाला ने फोटो का उपयोग पहले पन्ने पर मुख्य खबर के साथ किया है। इसलिए, आज के अखबारों में रूटीन खबरों के अलावा क्या खास हैं – उनपर भी एक नजर।

इंडियन एक्सप्रेस ने 'एक्सप्लेन्ड' में छापा है, "मोदी के दो भाषणों की कहानी : क्षेत्रीय अपेक्षाएं, 2019 में सबका विश्वास नया है।" अखबार ने लिखा है कि 2014 में संसद के केंद्रीय कक्ष में अपने भाषण में उन्होंने कहा था, मेरी सरकार गरीबों को समर्पित होगी और शनिवार को कहा, 2014 से 2019 तक हमलोगों ने गरीबों के लिए सरकार चलाई। अब गरीबों ने यह सरकार बनाई है। उन्होंने 2014 के अपने नारे, सबका साथ सबका विकास का विस्तार करके उसमें सबका विश्वास जोड़ दिया। कहने की जरूरत नहीं है कि आज के अखबारों में प्रधानमंत्री का कल का भाषण ही सबसे बड़ी खबर होना था। एक्सप्रेस और दूसरे अखबारों में भी ऐसा ही है। द टेलीग्राफ में भाषण की खबर लीड नहीं है लेकिन पहले पन्ने पर है। इसलिए, आज पहले पन्ने की ऐसी खबरों की चर्चा जो रूटीन से हटकर हैं।

द टेलीग्राफ ने आज अमर्त्य सेन का लेख छापा है। इसका शीर्षक हिन्दी में इस प्रकार होता, "मोदी ने सत्ता हासिल की है, आईडियाज का युद्ध नहीं जीता है"। लेख की शुरुआत होती है, प्रधानमंत्री नरेन्द्र मोदी ने अपनी हिन्दू राष्ट्रवादी भारतीय जनता पार्टी को देश के आम चुनाव में एक अहम जीत दिलाई है और 543 संसदीय सीटों में 300 से ज्यादा तथा देश चलाने के लिए पांच साल और जीत लिए हैं। यह एक प्रभावशाली जीत है पर श्री मोदी इसे कैसे हासिल कर पाए हैं और क्यों पुरानी राष्ट्रीय पार्टी इंडियन नेशनल कांग्रेस 52 सीटों पर सीमित रह गई है।

टाइम्स ऑफ इंडिया के पहले पन्ने खबरें तो चर्चा के लायक और भी हैं पर जो बात मुझे आज के अखबारों और सुर्खियों से अलग लगी वह है, कांग्रेस कार्य समिति की बैठक की खबर का शीर्षक। टाइम्स ऑफ इंडिया में यह रूटीन शीर्षक या सूचना से अलग है, "अशोक गहलोत, कमलनाथ और पी चिदंबरम ने अपने बेटों को पार्टी हित से ऊपर रखा : राहुल"। कहने की जरूरत नहीं है कि सीडब्ल्यूसी की बैठक में राहुल ने अगर ऐसा कहा तो खबर यही है। इस्तीफा देने और स्वीकार न होने की बातें और उसका सच तो हर कोई जानता है।

हिन्दुस्तान टाइम्स में पहले पन्ने पर दो कॉलम की खबर है, उत्तर प्रदेश के ट्यूब वेल में तीन बच्चों के शव मिले। मेरठ डेटलाइन की यह खबर मुमकिन है गाजियाबाद में मेरे घर आने वाले संस्करण में पहले पन्ने पर हो और बाकी में न हो - फिर भी आज के अखबारों में यह लीक से हट कर है और टाइम्स ऑफ इंडिया तथा इंडियन एक्सप्रेस में पहले पन्ने पर नहीं है। खबर के मुताबिक इन बच्चों का फिरौती के लिए अपहरण किया गया था और उनके शव गोलियों से छलनी हैं। उत्तर प्रदेश में डबल इंजन वाली भाजपा सरकार है और वहां कानून व्यवस्था का हाल बताने वाली यह खबर पहले पन्ने पर होना और न होना दोनों बड़ी बात है।

दैनिक हिन्दुस्तान में जिस खबर ने ध्यान खींचा वह है, "राफेल पर सरकार बोली सभी याचिकाएं रद्द करें"। बाद में मैंने चेक किया यह खबर टाइम्स ऑफ इंडिया में भी है लेकिन सिंगल कॉलम। मैं आपको खबर बताता हूं - राफेल मामले में सरकार ने सुप्रीम कोर्ट में अंतिम लिखित जवाब दायर किया है। इसमें कहा गया है कि इससे जुड़ी सभी समीक्षा याचिकाओं को खारिज किया जाए। इससे पहले अदालत में सीएजी की रिपोर्ट के हवाले से कहा गया था कि सरकार ने राफेल विमान 2.86% कम कीमत पर खरीदे हैं। जहां तक मुझे याद है, सीएजी की रिपोर्ट में आंकड़े नहीं थे, (क्योंकि कीमत गोपनीय है) पर रिपोर्ट कहती है कि कीमत कम है। जो हो, अदालत ने इन याचिकाओं पर फैसला सुरक्षित रखा है। यह खबर आज जितनी महत्वपूर्ण है उतनी प्रमुखता से दिखी नहीं।

नवभारत टाइम्स में शीला दीक्षित के घर पर मनोज तिवारी की फोटो टॉप पर है। ऊपर से नीचे तक चार कॉलम विज्ञापन के बावजूद। शीर्षक है, दो दिन पहले शीला को हराया था, तिवारी ने घर जाकर लिया आशीर्वाद। इस खबर के दो स्रोत बताए गए हैं, पीटीआई और वरिष्ठ संवाददाता। अखबार ने इसे प्रमुखता देने का कारण भी बताया है, जिन्हें चुनाव में करारी शिकस्त दी हो, उनके ही घर जाकर आशीर्वाद लेने की ऐसी तस्वीर राजनीति में विरले ही देखने को मिलेगी। हालांकि, इसे पढ़कर मुझे अखबार में नाम कहानी याद आ गई। खबर के मुताबिक, "उन्होंने (मनोज तिवारी) बताया कि चुनाव में शीला (दीक्षित) के उतरने की खबर सुनकर एक बार तो मैं घबरा गया था कि तीन बार मुख्यमंत्री का सामना कैसे करूंगा।

आपको याद होगा कि गए साल सितंबर में भाजपा अध्यक्ष अमित शाह ने कहा था कि हम 2019 का लोकसभा चुनाव जीतने जा रहे हैं और 2019 का चुनाव जीतने के बाद अगले 50 सालों तक कोई भी हमें हटा नहीं पाएगा। यह बात हम घमंड के कारण नहीं बल्कि अपने काम के बल पर बोल रहे हैं।

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